January 24, 2019

गोहद का जाट राजवंश


स न 1703 में राणा भीम सिंह गोहद की गद्दी पर बैठे उस समय तक मुगलों एवं जाटों के सम्बन्ध बिगड़ चुके थे। इसी कारण मुगलों के बफादार अटेर के भदौरिया राजा गोपाल सिंह ने गोहद पर आक्रमण कर अधिपत्य कर लिया।
इसके पश्चात पेशवा के प्रति स्वामिभक्ति के फलस्वरूप सन 1739 ई में पुनः गोहद प्राप्त हो सका।किन्तु शीघ्र ही उसका मराठाओं से ग्वालियर किले को लेकर विवाद हो गया। सन 1755 ई में मराठा सरदार महादजी शितोले ने ग्वालियर दुर्ग पर आक्रमण कर दिया भीमसिंह वीरतापूर्वक लड़ा किन्तु गंभीर रूप से घायल हो गया।
तीन दिन बाद उसका देहांत हो गया उसकी मुस्लिम प्रेयसी नर्तकी रोशन उसके शव के साथ सती हो गई। इस प्रकार अति महत्वाकांक्षा के चलते भीमसिंह मराठाओ के उपकार को भूल गया जिसकी कीमत उसने अपनी जान देकर चुकाई।
भीमसिंह के बाद राणा गिरधर प्रताप सिंह सन 1755 में अंतिम महीनों में गोहद की गद्दी पर बैठा पर वह 10 माह ही शासन कर सका। सन 1757 ई में प्रतापी छत्र सिंह गोहद का राजा हुआ।
सन 1761 ई में पानीपत के तीसरे युद्ध मे हुई मराठो की करारी हार का लाभ उठाते हुए उसने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। सन 1765 में महादजी सिंधिया ने ग्वालियर को फिर हथिया लिया। अब छत्र सिंह को दंड देना शेष था।
मार्च 1766 में मराठा सरदार रघुनाथराव ने गोहद पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध मे यद्यपि आरंभिक सफलता मराठाओ को मिली किन्तु फिर जाट सेना ने संभल कर शत्रु सेना पर आक्रमण कर दिया जिसमें मराठा सेना बुरी तरह परास्त हुई।


अक्टूबर 1766 ई में महदजी सिंधिया के नेतृत्व में गोहद किले का घेरा डाल दिया। गोलाबारी से किले का परकोटा तोड़ दिया गया इस युद्ध मे छत्र सिंह का दमाद मारा गया। राणा छत्र सिंह संधि के लिए विवश हो गया पर समझौता न हो सका ।
संधि प्रस्तव विफल होने पर रघुनाथ राव ने नवंबर 1766 में फिर गोहद पर आक्रमण कर दिया। जाट वीरता से लड़े । जाटों के तोपखाने की मार से सैकड़ो सैनिक मारे गए। अंततः मराठाओ को पराजय मिली। पर दोनो के बीच संघर्ष चलता रहा।
2 जनवरी 1767 को महादजी सिंधिया की मध्यस्थता में रघुनाथ राव और छत्र सिंह की संधि हो गई, पर जैसे ही रघुनाथ राव करोली तरफ गया छत्र सिंह ने मराठाओ के अधिपत्य की गड़ियों को छीन कर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उसकी ताकत बढ़ती गई। मई सन1768 ई में उसने भिण्ड पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।
अमायन और कैथा की गढ़ी भी जीत ली गई। अगस्त 1768 ई में भरत पुर के शासक जबाहर सिंह की हत्या हो गई। अब गोहद के राणा का कोई शक्ति शाली सहयोगी नही बचा। उसने मराठाओ के विरुद्ध मुगल सम्राट , अंग्रेज , फ्रांसीसी, तथा बंगाल के मीर कासिम तक से संपर्क किया पर कोई संतोषप्रद समाधान न हो सका।


सन 1780 में मराठाओ ने फिर गोहद पर आक्रमण किया। कैप्टन.पोफम के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना की मदद जाटों को मिलने से मराठों को गोहद से पलायन करना पड़ा। 
सन 1780 में जाटों ने लहार पर आक्रमण कर उसे लूट लिया गया। आंग्ल – जाट सेनाओं ने 4 अगस्त सन1780 को ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। यह राणा छत्र सिंह के जीवन की महान सफलता थी। 
सन 1783 में मराठों जाटों के इलाके को रौदाना आरम्भ कर दिया। सन 1783 ई में महादजी ने ग्वालियर किले का घेरा डाला। मराठों ने राणा के उच्च पद पर नियुक्त मोतीमल को अपनी ओर मिला लिया।सिंधिया ने दो बटालियन मोतिमल के अधिकृत क्षेत्र में भेजी और किले पर आधिपत्य कर लिया गया। 
जाट रानी महल के भीतर भाग में चली गई, उसने दरबाजे बन्द कर इमारत में आग लगा ली और स्वयं जल कर मर गई।
जनवरी 1784 ई को गोहद क़िले का घेरा डाल दिया गया। राणा छत्र सिंह की दशा अत्यंत सोचनीय थी।उसने अत्यंत निराश स्थिति में 1मार्च 1784 को उसने किला महादजी को सौप दिया। 
महादजी ने गोहद के राणा के निवास हेतु सबलगढ़ किले में ब्यबस्था की, पर राणा सबलगढ़ को पाकर भी बहुत दुखी था । अतः सबलगढ़ जाने के पूर्व ही करौली के शासक माणिक पाल यहाँ भाग् गया। 
महादजी की सेना ने उसका पीछा किया घबड़ा कर करौली के शासक ने राणा को कैद कर सपरिवार मराठों को सौप दिया। सन 1785 ई में विष देकर उसकी हत्या कर दी गई। 
छत्र सिंह पराजय और हत्या के बाद गोहद के दुर्दिन आ गए। यद्यपि अठारह वी सदी के अंत मे अंग्रेजों से प्रोत्साहन पाकर छत्र सिंह के चचेरे भाई तथा नीरपुरा के सामंत कु.ताराचंद के पुत्र कीर्ति सिंह को गोहद का राणा घोषित कर दिया गया।
गोहद किले में सिंधिया के सूबेदार अम्बा जी इंग्ले ने अंग्रेज़ो से संधि कर सन 1804 में गोहद का किला कीर्तिसिंह को सौप दिया।पर यह ब्यबस्था अल्पजीबी शिद्ध हुई। सिंधिया जैसे शक्तिशाली शासक का विरोध कर पाना अब अंग्रेज़ो के लिए संभव नही रह गया था।
22 नवंबर सन 1805 सर्ज़ी अंजन गांव की संधि संशोधित कर अंग्रेज़ो ने फिर ग्वालियर एवं गोहद किलो पर सिंधिया का अधिकार मान लिया ।
संधि अनुसार धौलपुर , बाड़ी , राजाखेड़ा के परगने गोहद के बदले राणा कीर्ति सिंह को प्राप्त हुए। दिसंबर 1805 ई में नई संधि के अनुसार कीर्ति सिंह धौलपुर रबाना हो गए। 
राणा कीर्ति सिंह के अनुयायीओं में राणा के गोहद छोड़ने को लेकर असंतोष हुआ । उन्होंने विद्रोह कर दिया । विद्रोह को दबाने के लिए 19 फरवरी 1806 को अंग्रेज़ो ने गोहद पर आक्रमण कर दिया।विद्रोहियो से समझौता पश्चात 27 फरवरी सन1806 ई को गोहद का किला सिंधिया को सौप दिया गया।
जाटों की 360 गढ़िया थी।गोहद का किला दुर्ग निर्माण कला का अद्भुत नमूना है। किले को वेसली नदी अर्धवृत्ताकार रूप में घेरे हुए है। किले बाह्य परकोटा लगभग 5 किमी का है जसमे सात द्वार इटवाली , बरथरा , गोहदी , विरखडी , कठवाँ , और खरौआ आदि गाँवों के नाम से है। इन दरबाजों मे आधा फ़ीट की कील युक्त सुदृढ़ फटाक लगबाये गए थे।
किले के भीतरी भाग में रक्षापंक्ति गहरी खाई तथा ऊँची प्राचीरों से निर्मित की गई है यह एक ओर लक्ष्मण ताल तथा दूसरी ओर गहरी वेसली नदी से सुरक्षित थी। इस प्राचीर में केबल हाथिया पौर और सांकल नाम से दो दरबाजे है।
राजा के व्यक्तिगत प्रासादों की सुरक्षा के लिए एक चौथी सुरक्षा पंक्ति तैयार की गई थी जो लगभग आधा किमी थी। किले के सभी मुख्य निर्माण इसी के अंदर है।इनमें सात भवर , शीश महल ,दीवाने आम आदि प्रमुख है।
केबल राणा छत्र सिंह द्वारा निर्मित नवीन महल इस प्राचीर के बाहर है। इस महल में घुमावदार ढलवे रास्ते से घोड़े पर बैठ कर ऊपरी मंजिल तक पहुँचा जा सकता है। 
राणा छत्र सिंह ने अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बेहट में एक पहाड़ी पर महल का निर्माण किया था।इस महल का नाम छत्रपुर रखा गया था। जाटों ने अपने राज्य में बड़ी संख्या में तालाब , मंदिरों आदि का निर्माण भी कराया था। 
राज्य की आय का मुख्य स्त्रोत कृषि पर लगने बाला कर था। कर की बसूली आनाज़ के रूप में की जाती थी। राज्य में जागीरदारी ब्यबस्था लागू थी।
कीर्ति सिंह के बाद देश की स्वाधीनता तक धौलपुर में 4 जाट शासक हुए। 15 अगस्त 1947 को उदयभान सिंह धौलपुर रियासत के शासक थे।
इस प्रकार हम देखते है कि जो जाट , जो सन 1505 ई में चम्बल पार कर ग्वालियर गोहद क्षेत्र में आये थे, तीन शताब्दी पश्चात बापस चम्बल पार उत्तर की ओर लौट गए।
संदर्भ – 1. अजय अग्निहोत्री कृत गोहद के जाटों का 
इतिहास।
2. ग्वालियर स्टेट गज़ेटियर

तू दृढ़ता की प्रतिमूर्ति , सुरक्षा का साधन, 
तू रणखोरों का का लोभ, समर का आकर्षण।
मैं भीमसिंह राणा की गौरव गाथा हूँ,
मैं उनकी अमर कीर्ति के गीत सुनता हूँ…….।
गोहद भिण्ड जिले का तहसील मुख्यालय और हमारी तहसील है।
गोहद में जाटों का स्वतंत्र शासन गोहद के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है। गोहद के प्राचीन दुर्ग की स्थापना के सम्बन्ध में एक क्विदंती है कि आज जहां प्राचीन दुर्ग स्थित है उस स्थान पर एक शेर और बकरी का युद्ध हो रहा था , गोहद के प्रथम शासक सिंहनदेव देव ने उस स्थान को अजेय मानते हुए वहाँ दुर्ग स्थापित किया।
राजपूताना गज़ेटियर के अनुसार ग्यारहवीं सदी में जब दिल्ली पर तोमरों का राज्य था तब एक जमीदार जाट परिवार को उन्होंने बमरौली की जागीर दी थी जिसे फिरोज़ तुग़लक़ के समय सन 1367 ई में आगरा के सूबेदार मुनीर मोहम्मद ने बमरौली छोड़ने पर विवश कर दिया।
यह परिवार बमरौली छोड़कर चम्बल पार ग्वालियर के तोमर राजाओं के पास पहुँचा । यहाँ इन्हें प्रमुख सामंत मानते हुए गोहद के समीप बरथरा में रहने को जगह दे दी। इसी वंश के सिंहनदेव द्वितीय को राजा मानसिंह तोमर ने सन 1505 ई में गोहद की ज़मीदारी तथा राणा की उपाधि दी।
सन 1523 ई में विक्रमादित्य तोमर को पराजित कर इब्राहिम लोदी ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया तब गोहद के जाटों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।मुगल काल मे ये मुगलों के राजभक्त जागीरदार बने रहे और मुगलों के सहयोग में सेना सहित युद्ध मे भाग लेते रहे।

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