जौहर कुंड – ग्वालियर दुर्ग

चित्तौड़ गढ़ के जौहर से सभी परिचित है पर इस तथ्य को कम लोग ही जानते है कि ग्वालियर दुर्ग पर भी बड़े जौहर हुए है। गोपांचल दुर्ग का इतिहास गीत , संगीत ,कला , साहित्य के साथ साथ शौर्य , पराक्रम , त्याग , बलिदान और आत्म उत्सर्ग के उदाहरणों से भरा हुआ है।


तरायन के द्वितीय युद्ध 1192 में चाहड़ देव तोमर की पराजय और मृत्यु के बाद दिल्ली पर तोमरों का साम्राज्य समाप्त हो गया। चाहड़ देव के पुत्र तेजपाल ने एक बार फिर दिल्ली प्राप्त करने की कोशिश की किन्तु 1193 में वह शाहबुद्दीन गौरी के हाथों परास्त हुआ।उसका सर कटबा कर दिल्ली में उसके राज प्रसाद पर टंगवा दिया।


तेजपाल के पुत्र अचल ब्रह्म ने अजमेर के शासक हरिराज के साथ मिल कर एक बार फिर दिल्ली प्राप्त करने का प्रयास किया। सन 1194 में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। निराश होकर अचल ब्रह्म अपने पुराने ठिकाने ऐसाह (मुरैना)की ओर चल पड़ा। इस समय त्रिभुवन गढ़ कुमारपाल एवं ग्वालियर गढ़ प्रतिहार वंसीय सुलक्षण पाल के अधीन था। सन 1196 में गौरी के आक्रमण के कारण दोनो गढ़ो का पराभव हो गया। प्रतिहारों ने ग्वालियर गढ़ प्राप्त करने के प्रयास जारी रखे।सन 1210 ई. में विग्रहराज प्रतिहार ने कुतुबुद्दीन ऐबक के पुत्र आरामशाह से ग्वालियर गढ़ छीन लिया। 


विग्रहराज के पुत्र मलयवर्मन का विवाह ऐसाह के राजा अचल ब्रम्ह की पुत्री से हुआ था। उधर दिल्ली गद्दी से आरामशाह को अपदस्थ कर इल्तुतमिश दिल्ली का सुलतान बना। सन1231 ई में इल्तुतमिश ने ग्वालियर गढ़ पर आंतरी की ओर से आक्रमण किया।गढ़ को चारों ओर से घेर लिया गया ।यह घेरा लंबे समय तक चला पर प्रतिरोध में कमी नही आई। तब हैबतखां चौहान को दूत बनाकर मलयदेववर्मन उर्फ सारंगदेव के पास भेज गया। उसने राजा के सम्मुख बेटी देने तथा अधीनता स्वीकार करने का प्रस्तव रखा। राजा ने उससे कहा कि यदि मरना न हो , तो तुरंत वापस लौट जाए।सारंगदेव के मंत्रियों ने युद्ध की सलाह दी ।भयंकर युद्ध हुआ हैबत खान चौहान मारा गया। तोमर , यादव ,सिकरवार योद्धाओं ने अद्भुत पराक्रम दिखाया। विवश होकर सुल्तान को पीछे हटना पड़ा। कुछ ही समय पश्चात उसने फिर आक्रमण कर दिया। सारंगदेव के अधिकांश योद्धा पहिले आक्रमण में मारे जा चुके थे।अतः उन्हें पराजय के आसार दिखाई देने लगे। बे रनिवास गए। तोमर रानी तथा दूसरी रानियों ने राजा से कहा – बे निश्चिंत होकर युद्ध करे, हम सभी उनके समक्ष ही जौहर की ज्वाला में प्राण त्याग देगी। जौहर का प्रबंध किया गया । चंदन की चिता तैयार की गई । 


अग्नि प्रज्वलित होते ही सभी रानियां श्रृंगार कर हँसती हुई जौहर कुण्ड में कूदने लगी। जौहर होते ही मलयवर्मन उर्फ सारंगदेव तुर्की सेना पर टूट पड़े ।इल्तुतमिश की सेना में खलबली मच गई।
तुर्की सेना के पाँच हजार से अधिक सैनिक मारे गए। मलयदेव बर्मन पन्द्रह सो सैनिकों के साथ रणभूमि में शहीद हुए।ग्वालियर किले का जौहर कुण्ड इस घटना का साक्षी है।
ग्वालियर दुर्ग पर भीमसिंह राणा की छत्री के समीप स्थित यह कुण्ड स्वयं अपनी कीर्ति गाथा का गान कर रहा है।इस आत्मोउत्सर्ग स्थल को देखने अबश्य जाए। यह जौहर चित्तौड़गढ़ के जौहर से बहुत पहिले का है ।इसे देख कर आपका मस्तक फक्र से ऊंचा हो जाएगा।
– रूपेश उपाध्याय
संयुक्त कलेक्टर
-आधार – हरिहर निवास द्विवेदी कृत ग्वालियर के तोमर

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