तत्कालीन ग्वालियर राज्य की धार्मिक नीति

तत्कालीन ग्वालियर राज्य की धार्मिक नीति

जिस राज्य में देवस्थानों की पूजा ठीक से होती है वह राज्य हमेशा उन्नति करता है ।”★
शिवाजी और उनके बाद सभी मराठा शासकों ने हिंदुत्व की रक्षा और धार्मिक सहिष्णुता की दोहरी नीति का अनुसरण किया। मराठा शासक हिन्दू धर्म के प्रबल समर्थक थे , किन्तु गैर हिन्दू प्रजा के साथ धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करते थे। ग्वालियर के सिंद्धिया शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता की इस नीति को जीवित रखा ।
सिंद्धिया वंश के संस्थापक राणो जी सिंद्धिया ने उज्जैन में मठ , मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तथा क्षिप्रा पर राम घाट का निर्माण कराया। उन्होंने सिंहस्थ मेले को राजकीय सम्मान देकर भव्य बनाया।
महाकालेश्वर मंदिर को गुलाम वंसीय शासक बलबन ने सन 1235 में तोड़ कर ध्वस्त कर दिया था। बाद में मुगल सम्राट ओरंगजेब ने उस स्थान पर मस्जिद का निर्माण करा दिया था।
जब राणो जी उज्जैन के प्रशासक नियुक्त हुए , उन्होंने मस्ज़िद को हटा कर सन 1734 में महाकालेश्वर मंदिर का नवनिर्माण कराया । उन्होंने महाकाल शिवलिंग को कोटि तीर्थ सरोवर से निकलवा कर नवनिर्मित मंदिर में स्थापित कराया।
महादजी ने इस परंपरागत धार्मिक नीति को आगे बढ़ाया। सन 1788 में उन्होंने गुलाम कादिर को परास्त कर मुगल बादशाह शाह आलम को पुनः दिल्ली पर स्थापित किया। शाह आलम उन से विशेष प्रशन्न हुआ। उसने गौ बध निषेध का फरमान जारी किया तथा मथुरा वृन्दावन का शासन महादजी को देकर पुरुस्कृत किया। 
महादजी ने उज्जैन में गऊ घाट और बाला जी मंदिर का निर्माण कराया था ,तथा 500 मनुष्यों को प्रतिदिन भोजन देने हेतु अन्न क्षेत्र आरम्भ किया।
जन्माष्टमी के समय गोरखी ग्वालियर में भव्य आयोजन होता था। महादजी मुस्लिम संत फ़कीरों में भी श्रद्धा रखते थे। महाराष्ट्र के बीड़ के प्रशिद्ध संत हज़रत मंसूर शाह उनके गुरु थे। उनके छोटे बेटे को ज़ागीर दी गई थी।
दौलत राव सिंद्धिया ने महाकाल मंदिर का सुप्रबंध किया। उज्जैन में गोपाल मंदिर का निर्माण करा कर राजवैभव से विभूषित किया।


जयाजी राव सिंधिया ने राज्य के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तथा माफियां दी । उन्होंने महाकाल मंदिर की व्यवस्था , माघ कार्तिक स्नान , शिवरात्रि श्रावण सोमवार उत्सव , चिता भस्म पूजा आदि का प्रबंध किया।
कहा जाता है कि जयाजी राव ने महाकाल में पुत्र प्राप्ति की कामना की थी और मनोकांक्षा पूर्ण होने पर सभी तहसीलों में शिव मंदिर बनाने का संकल्प लिया था। 
महाराज को पुत्ररत्न की प्राप्ति होने पर रियासत की प्रत्येक तहसील में श्री ज्येश्वर महादेव की प्रतिष्ठा करा कर सेवा अर्चनार्थ नेमणूक और भुमियों लगाई थी। मंसूर शाह के उर्स सहित सभी मुस्लिम त्योहारों में बे बड़ी श्रद्धा से भाग लेते थे।
माधो महाराज ने देवस्थानों की देखरेख और पूजा प्रबंध में व्यापक परिवर्तन हुए। उनका कहना था कि उनके “राज्य में कोई भी देवस्थान अपूज्य न रहे, क्योंकि जिस राज्य में देस्थानों की पूजा ठीक से होती है, वह राज्य हमेशा उन्नति करता है।”
ग्वालियर स्टेट के महज़बीं औकाफ की देख रेख के लिए उन्होंने औकाफ बोर्ड का गठन सन 1913 में किया था ताकि रियासत के सार्बजनिक देवस्थान अपूज्य न रहे तथा उनसे लगी संपत्ति का उपयोग उसी प्रयोजन के लिए हो जिसके लिए वह लगाई गई है।
उन्होंने रियासत में देवस्थानों के निर्माण के पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया तथा पुजारी की नियुक्ति के अधिकार भी राज्य के पास आ गए।
उनका कहना था कि
” देवस्थान बनाने बालो ने तो बना दिये ,पर उनकी देखरेख का ख्याल नही किया। नौबत यहाँ तक आ गई कि कुत्ते जानबर देवस्थानों को मैंला करने लगे । अतः आइंदा कोई देवस्थान न बनाये जब तक कि उसके मेंटीनेंस और साज़ संभाल के लिए एकमुश्त रक़म औकाफ को न दे दी जाबे । “
प्राचीन भारत मे धर्म और शिक्षा का घनिष्ठ सम्बन्ध होने से बे धर्म आधारित शिक्षा के पक्षधर थे। उनका मानना था कि ” धर्म से हीन होकर कोई भी कौम तरक्की नही कर सकती।” उन्होंने त्यौहारों के समय बच्चों को देवस्थानों पर ले जाने के आदेश दिए थे ताकि बच्चों को इसकी जानकारी हो।
बे कहते थे कि ” मैं ताजियेदारी भी करता हूँ और गणपति का उत्सव भी करता हूँ।” 
5 जून सन 1925 को माधव राव का पेरिश में स्वर्गवास हो गया। उस समय जीवाजी राव अवस्क थे।सन 1936 में राज्याधिकार मिलते ही देश के दूसरे भागों में फैल रही साम्प्रदायिकता के प्रति प्रजा को साबधान किया। उनका कहना था ” महजबी झगड़ों को नही उठाना चाहिए क्योंकि शांति के बिना न तो संतोष मिल सकता है और न सुख नशीब हो सकता है।” 


उन्होंने यह भी कहा कि ” जगदीश्वर मुझे मौका दे कि मैं अपने फ़र्ज़ मनशबी को हर हालत में धैर्य , धर्म , न्याय और सच्चाई के साथ अदा करता रहूँ। प्रजा के सुख संतोष में ही राजा और उसकी गवर्नमेंट और आराम मिल सकता है।”
इस प्रकार स्पष्ट है कि ग्वालियर एक हिन्दू रियासत थी पर राज्य द्वारा सभी धर्मालंबियों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करते हुए धार्मिक सहिष्णुता की नीति का पालन किया जाता था।
ग्वालियर के साम्प्रदायिक सद्भाव के सम्बन्ध में 15 जून 1943 को दैनिक हिन्दू ने लिखा था –
” There is a perfect freedom of worship for the muslims in gwalior state. They take out chaddar , tajia’s etc on the public raods in fornt of temples and have mealad on public roads. “

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