Around Gwalior

Moti Mahal – A starved legacy

Moti Mahal is on of the principal historical building of Gwalior. It has been the center of state power in central India for more than 130 years. It was constructed in 1825 by Scindia rulers of Gwalior in Hindu architectural style. Moti Mahal has more than 300 rooms. Gold has been polished on the walls of many rooms and columns of this historical building. Baijatal a cistern which was constructed to as an  Amphitheater in water adds a pearl in neck less . The gardens around Moti Mahal has an extensive network of Stone Fountains.

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कोशक महल चंदेरी

चंदेरी स्थित कोषक महल की यह इमारत मध्यकालीन अफगान स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इसका निर्माण मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने सन 1445 में कराया था।
कहा जाता है इस इमारत का निर्माण जौनपुर के शर्की सुल्तान को पराजित करने के उपलक्ष्य में कराया गया था। कुछ इतिहासकार कालपी विजय के उपलक्ष्य में कराया जाना बताते है। यह भी कहा जाता है कि इस इमारत का निर्माण चँदेरी के लोगो को रोजगार देने के उद्देश्य कराया गया था।
तारीख -ए- फरिश्ता के अनुसार ” हिजरी 848 मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी जब यहाँ से गुजरे तब उसने यहाँ कोशक- ए- हत्फ़ मंजिल अर्थात सात मंजिला इमारत बनाने का आदेश दिया। जिसकी तामील में यह इमारत बनाई गई। इसकी कारीगरी माण्डू जैसी है।

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अशोक नगर

कहा जाता है कि उज्जैन को जीतने के बाद सम्राट अशोक ने यहाँ विश्राम किया था । इस कारण इसका नाम अशोकनगर पड़ा।

अशोकनगर को गुना से अलग एक नए जिले के रूप में 16 वर्ष ही पूर्ण हुए है। इस तरह अभी तक यह युवा जिला ही माना जायेगा।
भौगोलिक दृष्टि से यह मालवा उत्तरी पठार का हिस्सा है। इसका कुछ भाग बुंदेलखंड अंतर्गत आता है। यह जिला वेतवा और सिंध नदी के मध्य में है।

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कोटेश्वर महादेव मंदिर ग्वालियर

कोटेश्वर महादेव मंदिर ग्वालियर नगर का प्रमुख और प्राचीन शिवालय है। एक देशस्थ मराठी ब्रह्माण्ड पंडित गंगाधर राव त्रयम्बक जी ने श्रीनाथ महादजी सिंधिया जी को कोटेश्वर शिवलिंग के इतिहास व् महत्ता को समझाया | जिसके बाद किले की तलहटी में इसका निर्माण मूलतः महायोद्धा श्रीनाथ महादजी शिन्दे महाराज द्वारा करवाया गया था। इसके ठीक १०० वर्षों बाद इसका जीर्णोद्धार एवं नवीनीकरण श्रीमंत जयाजीराव शिन्दे द्वारा किया गया। कोटेश्वर में स्थापित शिवलिंग ग्वालियर दुर्ग पर स्थित शिवमंदिर में स्थापित था। यह तोमर वंश के आराध्य एवं पूजा का केंद्र था।

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मित्रता का स्मारक है , दतिया का पुराना महल।

मध्य काल में सलीम और वीरसिंह बुन्देला जैसी मित्रता की दूसरी मिशाल देखने को नही मिलती है। दतिया का वीरसिंह जू देव महल दोनो की मित्रता की अमर निशानी है। यह महल मध्य काल में बुन्देलखण्ड में निर्मित इमारतों में स्थापत्य कला की दृष्टि से से सर्व श्रेष्ठ इमारत है।
इस इमारत से मेरी पहिचान और लगाव 25 वर्ष से भी ज्यादा समय से है। सन अस्सी के दशक में आठवी कक्षा में दतिया में जब एडमीशन हुआ तब पहली बार इस इमारत को देखा था।

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History Behind Saas Bahu Temple

There are some parts of India that once visited get into your heart and won’t go-Gwalior Fort is such a Place!

Gwalior fort is an 8th century hill fort which is located at Gwalior district in the central state of Madhya Pradesh.

The name of Gwalior is derived from the saint from Gwalipa- the story behind this name is there was king named Suraj sen who was badly affected by malady which is known as Leprosy and which was cured by the saint Gwalipa who used the water of Suraj kund “ Sun Tank” which is now located in Gwalior Fort.

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गोहद का जाट राजवंश

तू दृढ़ता की प्रतिमूर्ति , सुरक्षा का साधन,
तू रणखोरों का का लोभ, समर का आकर्षण।
मैं भीमसिंह राणा की गौरव गाथा हूँ,
मैं उनकी अमर कीर्ति के गीत सुनता हूँ…….।

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एसाह / सिहोनिया

ऐसाह और सिहोनिया मुरैना जिले की अम्बाह तहसील में प्राचीन ऐतिहासिक स्थान है। ऐसाह “ग्वालियर के तोमर वंश ” का उदगम स्थल है। ऐसाह को कभी “ऐसाह मणि” कहा जाता था। ऐसाह का मतलब ईश से है और समीप के गाँव सिहोनिया में अम्बिका देवी का मंदिर है। ईश और अम्बा ये स्थल कभी तोमर शक्ति की धुरी थे।

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आह गम – ए – गन्ना बेगम Noorabad

अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए महादजी ने गन्ना बेगम के मकबरे पर फारसी में लिखवाया था, ‘आह-गम-ए-गन्ना बेग़म’, यानी गन्ना बेगम के गम में निकली आह।

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जौहर कुंड – ग्वालियर दुर्ग

क्या आप जानते हैं , इब्नबतूता 1342ई मैं मुरेना जिले के जोरा- अलापुर आया था 

जौरा ग्वालियर स्टेट के दौरान सन 1904 तक सिकरवारी का सूबा अर्थात ज़िला मुख्यालय रहा है। सन 1905 में ग्वालियर स्टेट में जिला पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर तंवरघार सिकरवारी ज़िले को मिलाकर एक ज़िला बनाया गया जिसका मुख्यालय जौरा में रखा गया।

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