Jora Alapur / जौरा अलापुर

Jora Alapur / जौरा अलापुर

क्या आप जानते हैं , इब्नबतूता 1342ई मैं मुरेना जिले के जोरा- अलापुर आया था 

जौरा ग्वालियर स्टेट के दौरान सन 1904 तक सिकरवारी का सूबा अर्थात ज़िला मुख्यालय रहा है। सन 1905 में ग्वालियर स्टेट में जिला पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर तंवरघार सिकरवारी ज़िले को मिलाकर एक ज़िला बनाया गया जिसका मुख्यालय जौरा में रखा गया।
जौरा के गर्ल्स स्कूल में सूबात अर्थात कलेक्ट्रेट थी और वर्तमान SDM कार्यलय सूबा का निवास था। सन 1929 में ज़िला मुख्यालय मुरैना स्थानांतरित होने तक जौरा सिकरवारी और तंवरघार ज़िले का मुख्यालय रहा।

जौरा के समीप अलापुर अत्यंत प्राचीन ग्राम है। ग्वालियर स्टेट गज़ेटियर सन 1911के अनुसार ” इसमे बहुत से पुराने दिलचस्प निशानात मिलते है और मुमकिन है कि यह वही अलापुर हो जिसका जिक्र इब्नबतूता ने किया है, कि आगरा से ग्वालियर के रास्ते पर वांका है। ”
सन 1901 में अलापुर की आवादी 2096 थी। उस समय मुरेना नूराबाद तहसील का बड़ा गांव था और उसकी आवादी स न 1901में 2099 थी।

इब्नबतूता स न 1342 ई. में अलापुर आया।उस समय दिल्ली की तुर्क सल्तनत की ओर से बद्र नामक हब्सी दास अमीर (प्रशासक) था। इब्नबतूता के अनुसार ” वह बड़ा लम्बा और मज़बूत था और एक बार मे पूरी एक भेड़ खा जाता था तथा भोजन के पश्चात तीन पाव घी पी जाता था।””उसका पुत्र भी उसी के आकार प्रकार का था । बद्र आसपास के इलाकों पर आक्रमण कर देता था और वहाँ के हिंदुओं को या तो मार डालता या फिर बंदी बना लेता था ।”इब्नबतूता के अनुसार ” इस प्रकार वह दूर-दूर तक बहुत प्रशिद्ध हो गया और काफ़िर ( हिन्दू ) उससे डरने लगें। चम्बल के तोमरों का इलाका आलापुर से ‘ एक दिन की यात्रा ‘ की दूरी पर था। तोमरों के इलाके के एक गाँव पर भी बद्र ने आक्रमण कर दिया। संभवतः उस गाँव के निवासियों ने उसका प्रतिरोध किया। इस युद्ध मे बद्र घोड़े सहित एक गढ्ढे में जा गिरा वहीं एक ग्रामवासी जा घुसा और कटार से उसकी हत्या कर दी। बद्र की सेना ने आक्रोश में आकर उस ग्राम के पुरुषों की हत्या कर दी महिलाओं को बंदी बना लिया और सब कुछ लूट लिया।” बद्र के सैनिक घोड़े को लेकर अलापुर पहुँचे और उसे बद्र के पुत्र को दे दिया।बद्र का वध ऐसाह के तोमरों के क्षेत्र में हिंदुओं के गांव में हुआ था । बद्र के पुत्र ने उनसे अकेले झगड़ना ठीक नही समझा और अपने पिता के घोड़े पर बैठ कर दिल्ली के सुल्तान के पास फरियाद के लिए चल दिया। ऐसाह के तोमर शासक कमलसिंह उर्फ घाटम देव सतर्क हुए और उन्होंने बद्र के पुत्र को मार डाला। इसके बाद आलमपुर का प्रशासन बद्र के दामाद ने संभाला। तोमरों ने उसे भी मार डाला ।

इब्नबतूता के अनुसार ” यहाँ गेहूँ उत्तम प्रकार का होता है और यहाँ से दिल्ली भेजा जाता है। हिन्दू बड़े डीलडौल के तथा रूपबान है।उनकी स्त्रियां बड़ी ही रूपवती है। “

मुगल बादशाह मुहम्मद शाह की ओर से ग्वालियर में सरदार पीर खान को अपना फौजदार नियुक्त किया गया था । पीर खान नरवर के प्रधान मंत्री और सेनापति खंडेराव से विद्वेष रखने लगा था और नरवर पर कब्जा करना चाहता था । खाण्डेराव के पुत्र सूरत राय ने उसे अलापुर के मैदान में सन 1781 में परास्त किया था। सूरत राय की इस जोरदार विजय के उपलक्ष्य में इसका नाम जौरा रखा गया। खंडेराव दो माह तक अलापुर रहे यहाँ उन्होंने एक गड़ी का निर्माण करबाया और उसके सामने अथाह जल बाला कुआ खुदवा कर बीजक लगबया।
बाद में यह क्षेत्र ग्वालियर के सिंधिया शासकों के अधीन आया उन्होंने जौरा में जिला मुख्यालय कायम किया।

सन 1896 के पश्चात ग्रेट इण्डिया पेनिंनशूला कंपनी ने दिल्ली बम्बई रेलवे लाइन डाली । तब मुरैना स्टेशन बना। स्टेशन के कारण वहाँ कॉटन जीन , मंडी , मुनिस्पेलटी आदि 1901 में कायम हुई ।

मुरैना में हुई तरक्की के कारण 1929 में ज़िला मुख्यालय मुरैना स्थान्तरित हो गया और जौरा अलापुर के दुर्दिन आरंभ हो गए। बाद में गाँधी वादी चिंतक सुब्बाराव जी ने यहाँ गाँधी आश्रम स्थापित किया। सदी का सबसे बड़ा दस्यु समर्पण जौरा में हुआ फिर भी जौरा के दिन नही फिरे। अपने अमरूद , मंगौड़े और गुड़ के लिए प्रशिद्ध कभी ज़िला मुख्यालय रहा जौरा अलापुर केवल तहसील मुख्यालय बन कर रह गया।

– रूपेश उपाध्याय
संयुक्त कलेक्टर
आधार – हरिहर निवास द्विवेदी कृत ” ग्वालियर के तोमर”

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