12 February 1798 — 1833

ग्वालियर का बैजाताल महारानी बैजाबाई के नाम से है।उज्जैन का द्वारिकाधीश गोपाल मंदिर , शिवपुरी छत्री में बने राम सीता एवं राधा कृष्ण मंदिर , भदैया कुण्ड शिवपुरी में गोमुख एवं बारादरी , शिवपुरी का चिंताहरण मंदिर आदि का निर्माण महारानी बैजाबाई द्वरा ही कराया गया।
यह सब जानने के बाद महारानी बैजाबाई के बारे में जानने की इच्छा बार बार मन मे होती , पर उनके बारें में ज्यादा कुछ पता नही लग पा रहा था।इतिहास की पुस्तकों में यह विवरण अत्यंत संक्षिप्त रूप में ही मिला पाया जिससे उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में ज्यादा कुछ अंदाज नही लग रहा था।
इसी तलाश में मेरा नटनागर शोध संस्थान सीतामऊ ज़िला मन्दसौर जाना हुआ। तब ज्ञात हुआ कि महारानी बैजाबाई उन राज महिषीयों में थी जिन्होंने शौन्दर्य के बलबूते पर सत्ता तो प्राप्त की पर अपने पति महाराज दौलत राव के प्रति एकात्म समर्पण के साथ साथ अपने कुशल प्रशासन से प्रजापालन एवं अंग्रेज़ो की कुटिनीतिक चालों से ग्वालियर राज्य की रक्षा करने में सफल रही ।
दौलत राव की मृत्यु के पश्चात रीजेंट की भूमिका में विपरीत परिस्थितियों में साहस ,धैर्य और कौशल से ग्वालियर राज्य का हित संरक्षण किया। उनके द्वारा तीर्थो में मंदिर , धर्मशालाएं , घाट एवं स्थापित किये गए अन्नक्षेत्र आदि पुण्य कार्यउनकी कीर्ति पताका को आज भी फहरा रहे है।
बैजाबाई के पिता सर्जेराव घाटगे को क्रूरता और अधिकार लिप्सा के कारण मराठा इतिहास में कुटिलता की प्रतिमूर्ति के रूप में चित्रित किया गया है।
” सचित्र दरबार” के ग्वालियर अंक में उन्हें कर्मवीर और राजनैतिक चाणक्य कहा गया है। उनकी पुत्री बैजाबाई अखण्ड सौभाग्य की ओर बढ़ रही थी उनकी सुंदरता की चर्चा सारे हिंदुस्तान में फैल रही थी।
जब यह खबर ग्वालियर के महाराज दौलतराव तक पहुँची तब उन्होंने दक्षिण की इस सौन्दर्य लता को अपनी सहधर्मिणी बनाने का निश्चय कर लिया। अंततः 1798 में बैजाबाई का विवाह दौलतराव से हो गया।
बैजाबाई के रूपलावण्य के कारण एक ओर पेशवा बाजीराव दूसरी ओर दौलत राव ।दोनो ही उनसे विवाह करने को उत्सुक थे। किंतु बैजाबाई के पिता सर्जेराव ने राजनीतिक दृष्टि दौलतराव से विवाह को प्राथमिकता दी। 
इस प्रकार यह ” राजनैतिक विवाह ” था। अब सर्जेराव सिंद्धिया का शक्तिशाली अधिकारी और मंत्री बन गया युवक दौलत राव पर उसका अत्यधिक प्रभाव बढ़ गया।
दौलतराव ने जहाँ बायजाबाई को मनप्राण से चाहा तो बायजाबाई ने भी पूरे एकात्म समर्पण भाव से दौलतराव की अंतिम घड़ियों तक धर्मनिष्ठा से साथ निभाया। बे दौलतराव की प्राणरक्षा के लिए विविध अनुष्ठान दान चेष्टाओं में प्रबर्त्त हो गई। 
मथुरा के 2000 माथुर चतुर्वेदियों एवं काशी के 2000 नैष्ठिक वैदिकों को उनके द्वारा प्रत्येक को एक सेर लड्डू ,एक एक रुपया एवं अक्षत पूरित ताम्रपात्र देने का उल्लेख मिलता है। इसके साथ साथ गोदान आदि विविध अनुष्ठान भी आयोजित किये गए।
21मार्च 1827 को दौलतराव का स्वर्गवास हो गया। तब दौलतराव के दूर के सम्बन्धी 11 वर्षीय बालक को जनकोजी राव के नाम से सिंहासन पर बिठा कर बैजाबाई रीजेंट के रूप में शासन करने लगी। 
दरबार के कुचक्रो के कारण दोनो के संबंध अच्छे नही रहे। अंग्रेज भी इस स्थिति का फायदा उठाने को प्रयास करने लगे। इन कठिन परिस्थितियों का उन्होंने डटकर सामना किया और धैर्य और कौशल से षड्यंत्र और कुचेष्टाओं को बिफल कर दिया।
बायजाबाई ने अपने सुशासन से प्रजाजनों पर सुकीर्ति की छाप बैठा दी। भूमि कर की समीक्षा की गई।स्थान स्थान पर भण्डारे की व्यवस्था की गई । उनके राज्य में कोई भूखा निराश्रित न रह पाए यह उनका संकल्प था।
अंग्रेज़ो की धूर्तता की काट करने में उन्होंने कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया।उन्होंने चंदेरी पर आक्रमण कर फतह किया।आसपास के बुंदेलखंड के राज्यो पर विजय प्राप्त कर ग्वालियर राज्य की सीमा का विस्तार किया। 


उनकी उपलब्धि प्रजा ,सामंतों और विरोधियों पर धाक जमाने बाली थी।युद्ध धर्मी मराठा मानसिकता उनके इकबाल की कायल हो गई।
जनकोजी शासन पर पूर्ण अधिपत्य चाह रहे थे और बायजाबाई उसे छोड़ने को तैयार नही थी।अंग्रेज़ भी बैजाबाई के व्यक्तित्व कृतित्व से परेशानी अनुभव करने लगे थे। इस टकराव के चलते जनकोजीराव द्वारा उन्हें बंदी बनाने की विफल चेष्टा की। अंततः उन्हें ग्वालियर छोड़ना पड़ा।
इस निर्वासन काल का भी उन्होंने सकारात्मक उपयोग किया। यह उनके लिए आत्मबल को सुदृढ़ बनाने उपासना और तीर्थाटन के काम आया। बे धौलपुर आगरा होते हुए ब्रजमंडल पहुँची। वे बृन्दावन और गोकुल गई। यहाँ समस्त चतुर्वेदी परिवारों को दान दक्षिणा दी। 
बलदेव की यात्रा की।प्रयाग जाकर अन्नक्षेत्र स्थापित किया। इसके बाद बे नासिक ,पंढरपुर और उज्जैन गई।बायजाबाई का पुण्य शीघ्र ही फलित हुआ। उनका काशी का खज़ाना 37 लाख रुपये का अंग्रेज़ो ने जब्त कर लिया था उन्हें बापस लौटा दिया गया।
ग्वालियर राज्य से उन्हें 4 लाख रुपये की पेंशन स्वीकृत की गई।उज्जैन का मुहाल उन्हें व्यक्तिगत खर्च के लिए दिया गया। दौलत राव की मृत्यु के बाद बायजाबाई का निजी जीवन सादगी भरा और सुखोभोग विरत हो गया था। वे सदैव जमीन पर सोई।राजकाज से शेष समय उन्होंने हरि स्मरण में लगाया।


काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्ञान वापी मण्डप तथा काशी में गंगा किनारे सिंधिया घाट उनके द्वारा ही बनबाया गया। तीर्थो में उनके द्वारा उनके द्वारा बनबाये गए मंदिर ,धर्मशालाएं ,घाट तथा अन्न सत्र आज भी उनकी कीर्ति कथा का बखान कर रहे है। 
उज्जैन का गोपाल मंदिर उनकी भक्ति का पावन स्मारक है।बायजाबाई ने अपनी नातिन चिमणा राजा का विवाह जयाजीराव से करबाया। 27 जून 1863 को लश्कर में उनका निधन हो गया।
उन्होंने शान से शासन किया था और सम्मान के साथ अंतिम सांस ली। उनकी राजसी गरिमा आजीवन बनी रही। जहां तक शिंदेशाही की बात है बायजाबाई अद्वितीय सिद्ध हुई।

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