This is the story of one of the most opulent private residence built in Mumbai. Today, Mukesh Ambani’s Xanadu called “Antilla” towers over the city of Mumbai. It undoubtedly holds the title of being the most lavish Mumbai residence ever built. However, Antilla did have predecessors who shared the title of the most opulent homes in Mumbai. As per my extensive research on this topic, the homes which would qualify as most opulent Mumbai residences would be Petit Hall of Sir Dinshaw Petits, Jay Mahal palace of Gaekwads of Baroda and Samudra Mahal palace of the Scindias of Gwalior.

चंदेरी स्थित कोषक महल की यह इमारत मध्यकालीन अफगान स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इसका निर्माण मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने सन 1445 में कराया था।
कहा जाता है इस इमारत का निर्माण जौनपुर के शर्की सुल्तान को पराजित करने के उपलक्ष्य में कराया गया था। कुछ इतिहासकार कालपी विजय के उपलक्ष्य में कराया जाना बताते है। यह भी कहा जाता है कि इस इमारत का निर्माण चँदेरी के लोगो को रोजगार देने के उद्देश्य कराया गया था।
तारीख -ए- फरिश्ता के अनुसार ” हिजरी 848 मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी जब यहाँ से गुजरे तब उसने यहाँ कोशक- ए- हत्फ़ मंजिल अर्थात सात मंजिला इमारत बनाने का आदेश दिया। जिसकी तामील में यह इमारत बनाई गई। इसकी कारीगरी माण्डू जैसी है।

कहा जाता है कि उज्जैन को जीतने के बाद सम्राट अशोक ने यहाँ विश्राम किया था । इस कारण इसका नाम अशोकनगर पड़ा।

अशोकनगर को गुना से अलग एक नए जिले के रूप में 16 वर्ष ही पूर्ण हुए है। इस तरह अभी तक यह युवा जिला ही माना जायेगा।
भौगोलिक दृष्टि से यह मालवा उत्तरी पठार का हिस्सा है। इसका कुछ भाग बुंदेलखंड अंतर्गत आता है। यह जिला वेतवा और सिंध नदी के मध्य में है।

कोटेश्वर महादेव मंदिर ग्वालियर नगर का प्रमुख और प्राचीन शिवालय है। एक देशस्थ मराठी ब्रह्माण्ड पंडित गंगाधर राव त्रयम्बक जी ने श्रीनाथ महादजी सिंधिया जी को कोटेश्वर शिवलिंग के इतिहास व् महत्ता को समझाया | जिसके बाद किले की तलहटी में इसका निर्माण मूलतः महायोद्धा श्रीनाथ महादजी शिन्दे महाराज द्वारा करवाया गया था। इसके ठीक १०० वर्षों बाद इसका जीर्णोद्धार एवं नवीनीकरण श्रीमंत जयाजीराव शिन्दे द्वारा किया गया। कोटेश्वर में स्थापित शिवलिंग ग्वालियर दुर्ग पर स्थित शिवमंदिर में स्थापित था। यह तोमर वंश के आराध्य एवं पूजा का केंद्र था।

मध्य काल में सलीम और वीरसिंह बुन्देला जैसी मित्रता की दूसरी मिशाल देखने को नही मिलती है। दतिया का वीरसिंह जू देव महल दोनो की मित्रता की अमर निशानी है। यह महल मध्य काल में बुन्देलखण्ड में निर्मित इमारतों में स्थापत्य कला की दृष्टि से से सर्व श्रेष्ठ इमारत है।
इस इमारत से मेरी पहिचान और लगाव 25 वर्ष से भी ज्यादा समय से है। सन अस्सी के दशक में आठवी कक्षा में दतिया में जब एडमीशन हुआ तब पहली बार इस इमारत को देखा था।

There are some parts of India that once visited get into your heart and won’t go-Gwalior Fort is such a Place!

Gwalior fort is an 8th century hill fort which is located at Gwalior district in the central state of Madhya Pradesh.

The name of Gwalior is derived from the saint from Gwalipa- the story behind this name is there was king named Suraj sen who was badly affected by malady which is known as Leprosy and which was cured by the saint Gwalipa who used the water of Suraj kund “ Sun Tank” which is now located in Gwalior Fort.

ग्वालियर का बैजाताल महारानी बैजाबाई के नाम से है।उज्जैन का द्वारिकाधीश गोपाल मंदिर , शिवपुरी छत्री में बने राम सीता एवं राधा कृष्ण मंदिर , भदैया कुण्ड शिवपुरी में गोमुख एवं बारादरी , शिवपुरी का चिंताहरण मंदिर आदि का निर्माण महारानी बैजाबाई द्वरा ही कराया गया।
यह सब जानने के बाद महारानी बैजाबाई के बारे में जानने की इच्छा बार बार मन मे होती , पर उनके बारें में ज्यादा कुछ पता नही लग पा रहा था।इतिहास की पुस्तकों में यह विवरण अत्यंत संक्षिप्त रूप में ही मिला पाया जिससे उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में ज्यादा कुछ अंदाज नही लग रहा था।

राजनीतिज्ञ केबल चुनाव के चिंता करता है और राजदर्शी आने बाली पीढ़ियों के कल्याण की। सिंधिया वंश के संस्थापक सरदार राणो जी शिंदे के पांचवे और अंतिम पुत्र महादजी सिंधिया पहिले राजदर्शी थे और फिर राजनीतिज्ञ। पानीपत के तीसरे युद्ध सन 1761 मे पराजय से मराठा शक्ति को गहरा आघात लगा था ।घायल अबस्था में महादजी को छोड़कर राणो जी के सभी पुत्र मारे गए थे।
पानीपत की पराजय के आघात से मराठा शक्ति उबारने और उसे चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने का काम महादजी जैसे योद्धा और राजदर्शी ही कर सकते थे।

क्या आप जानते हैं , इब्नबतूता 1342ई मैं मुरेना जिले के जोरा- अलापुर आया था 

जौरा ग्वालियर स्टेट के दौरान सन 1904 तक सिकरवारी का सूबा अर्थात ज़िला मुख्यालय रहा है। सन 1905 में ग्वालियर स्टेट में जिला पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर तंवरघार सिकरवारी ज़िले को मिलाकर एक ज़िला बनाया गया जिसका मुख्यालय जौरा में रखा गया।

क्या आप जानते हैं , इब्नबतूता 1342ई मैं मुरेना जिले के जोरा- अलापुर आया था 

जौरा ग्वालियर स्टेट के दौरान सन 1904 तक सिकरवारी का सूबा अर्थात ज़िला मुख्यालय रहा है। सन 1905 में ग्वालियर स्टेट में जिला पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर तंवरघार सिकरवारी ज़िले को मिलाकर एक ज़िला बनाया गया जिसका मुख्यालय जौरा में रखा गया।