मान्यता है की रामायण काल मैं महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं था व् लव और कुश का जन्म भी इसी प्रांगन मैं हुआ था |

जब होली के रंगों में भक्ति और वात्सल्य का रस मिल जाता है , तब ये रंग और गहरे हो जाते है।
भक्ति और वात्सल्य रस से सराबोर राई और बधाई नृत्य साधना का यह देश का सबसे बड़ा उत्सव है।
यहाँ का आनंद अद्भुत और अपूर्व है।

कोटेश्वर महादेव मंदिर ग्वालियर नगर का प्रमुख और प्राचीन शिवालय है। एक देशस्थ मराठी ब्रह्माण्ड पंडित गंगाधर राव त्रयम्बक जी ने श्रीनाथ महादजी सिंधिया जी को कोटेश्वर शिवलिंग के इतिहास व् महत्ता को समझाया | जिसके बाद किले की तलहटी में इसका निर्माण मूलतः महायोद्धा श्रीनाथ महादजी शिन्दे महाराज द्वारा करवाया गया था। इसके ठीक १०० वर्षों बाद इसका जीर्णोद्धार एवं नवीनीकरण श्रीमंत जयाजीराव शिन्दे द्वारा किया गया। कोटेश्वर में स्थापित शिवलिंग ग्वालियर दुर्ग पर स्थित शिवमंदिर में स्थापित था। यह तोमर वंश के आराध्य एवं पूजा का केंद्र था।